क्रिकेट भारत की अटेंशन इकॉनमी में अब भी सबसे मजबूत ताकत है, लेकिन उस ध्यान का स्वरूप बदल रहा है। अब फैन केवल राष्ट्रीय नैरेटिव से खेल को नहीं पढ़ते, वे उसमें शहर, भाषा और डिजिटल आदत भी जोड़ते हैं।

इसीलिए स्पोर्ट्स कवरेज को अधिक क्षेत्रीय होना होगा, बिना संकीर्ण हुए। कानपुर, प्रयागराज या लखनऊ का पाठक राष्ट्रीय महत्व भी चाहता है और स्थानीय कोण भी।

स्पोर्ट्स पब्लिशिंग का भविष्य उन्हीं ब्रांड्स का है जो पैमाने और अपनत्व दोनों समझते हैं।

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भारत की मिड-मार्केट खपत कहानी अब सिर्फ मेट्रो नहीं, छोटे शहर लिख रहे हैं
बिजनेस नई दिल्ली
भारत की मिड-मार्केट खपत कहानी अब सिर्फ मेट्रो नहीं, छोटे शहर लिख रहे हैं

रिटेल और वित्तीय कंपनियां अब जिला स्तर की मांग को मेट्रो संकेतों जितना अहम मान रही हैं।

Nazia Khan एक दिन पहले
कानपुर का पानी संकट सिर्फ सप्लाई नहीं, प्लानिंग अनुशासन की कहानी क्यों है
नागरिक मुद्दे कानपुर
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कानपुर में जल दबाव का सवाल जितना सप्लाई का है, उतना ही लीक, समन्वय और डिलीवरी टाइमिंग का भी है।

Raghav Mehrotra एक दिन पहले
वाराणसी की सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था ध्यान को कमाई में बदलना सीख रही है, बिना गहराई खोए
मनोरंजन वाराणसी
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शहर की अगली चुनौती है कि प्रामाणिकता को बचाते हुए पर्यटन और पैमाने दोनों को संभाला जाए।

Garvit Bajpai एक दिन पहले
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