क्रिकेट भारत की अटेंशन इकॉनमी में अब भी सबसे मजबूत ताकत है, लेकिन उस ध्यान का स्वरूप बदल रहा है। अब फैन केवल राष्ट्रीय नैरेटिव से खेल को नहीं पढ़ते, वे उसमें शहर, भाषा और डिजिटल आदत भी जोड़ते हैं।
इसीलिए स्पोर्ट्स कवरेज को अधिक क्षेत्रीय होना होगा, बिना संकीर्ण हुए। कानपुर, प्रयागराज या लखनऊ का पाठक राष्ट्रीय महत्व भी चाहता है और स्थानीय कोण भी।
स्पोर्ट्स पब्लिशिंग का भविष्य उन्हीं ब्रांड्स का है जो पैमाने और अपनत्व दोनों समझते हैं।