वाराणसी विरासत और बड़े पैमाने के ध्यान के बीच खड़े शहर की तरह जीता है। अब संस्कृति को लॉजिस्टिक्स, विज़िटर मैनेजमेंट और बाहरी दुनिया के लिए पठनीय बने रहने से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
फिर भी उसकी ताकत उसकी परतदारता, अनुष्ठान और समय की गहराई में है। इसलिए सबसे मजबूत काम वे संस्थान और स्थानीय नेटवर्क कर रहे हैं जो अर्थ और पैमाने के बीच संतुलन बना पा रहे हैं।
यह सबक केवल वाराणसी तक सीमित नहीं है। भारत के सांस्कृतिक शहरों पर ऐसी कवरेज की जरूरत है जो पहचान को नागरिक और आर्थिक दोनों ढांचे के रूप में समझे।